सरकार और न्यायपालिका में तकरार

यदि आप लोगों से पूछेंगे की इस दुनिया में न्याय कौन करता है तो लोगों का मत होगा ईश्वर और देश की अदालतें यानि न्यायपालिका और चूँकि ईश्वर को किसी ने देखा नही/जाना नहीं तो भारत देश में भारतीय न्यायपालिका को ईश्वर का दरबार और न्यायाधीशों को ईश्वर का दर्ज़ा प्राप्त है, भारतीय न्यायपालिका अपनी निरपेक्षता ,निष्पक्षता,स्वंत्रता,प्रितिष्ठा के लिए जानी जाती है जिसका उल्लेख वह ‘सत्यमेव जयते’ शब्द से करती है इसीलिए यह केवल एक शब्द न होकर पुरे देश के लोगों की उम्मीद और भरोसा है की जीत सत्य की होगी|
न्यायपालिका में किसी के साथ पक्षपात नहीं होता क्यूंकि यह तथ्यों व् स्वंत्रता से फैसले लेती है,अब बात आती है न्याय करने वाले व्यक्ति की जिसे कानूनी भाषा में न्यायाधीश कहते है,भारत में जब सविंधान का निर्माण हुआ तो हमने संघीय व्यवस्था के तहत ‘स्वंतंत्र न्य्यापलिका’ को अपनाया, यानि न्यायपालिका अपने हर कार्य में स्वतंत्र है और बिना किसी राजनातिक हस्तक्षेप के व् बिना किसी प्रकार के भेदभाव के बिना श्रेष्ठ व् स्वंत्र न्याय देने में सक्षम व् प्रितिबद्ध है यह स्वंत्रता का मतलब न्यायधिशो के चुनाव प्रिक्रिया से भी है|
भारत में तीन तरह की न्यायलय होती है 1- उच्चतम न्यायालय,2- उच्च न्यायालय और 3- निचली अदालतें ,प्रतेक न्यायालय में न्यायधीशो की चुनाव प्रिक्रिया एक व्यापक व् विशेष प्रिकिया से होती है जिनमे यह विशेष तौर पर ध्यान रखा जाता है की न्यायाधीशो की नियुक्तियों में किसी भी तरह का राजनैतिक हस्तक्षेप न हो|
उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशो की नियुक्ति विषय में भारतीय सविंधान के अनुच्छेद 124(1) में कहा गया है की उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीशो की नियुक्ति की दशा में राष्ट्रपति को भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श करना अनिवार्य है हालाँकि परामर्श शब्द पर कुछ दिनों विवाद रहा वहीँ सविंधान के अनुच्छेद 143 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा किये गए एक निर्देश में उच्चतम न्यायालय के नौ न्यायाधीशो की पीठ ने राय दी की भारत के मुख्य न्यायमूर्ति की राय ,जिसे परामर्श की प्रक्रिया में प्रमुखता दी जाती है और जिसमे न्यायपालिका की राय प्रतिबिंबित होती है,ऐसी मंडली यानि कोलेगियम से परामर्श के आधार पर बनायीं जानी होती है जिसमे भारत के मुख्य न्यायमूर्ति व् उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होगें| इसे तृतीय न्यायाधीश मामला(1998) भी कहा जाता है|
और अन्य उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति सम्बन्धी अहिर्तायें सविधान के अनुच्छेद 124(3) में डी गई है,यही प्रक्रिया उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के सम्बन्ध में है जिसमे राष्ट्रपति, भारत के मुख्य न्यायमूर्ति व् राज्य के राज्यपाल व् उच्चतम न्यायालय के दो वरिय्तम न्यायाधीश(जो भारत के मुख्य न्यायाधीश को सलाह दे सकते है) से सलाह करके न्यायाधीशों की नियुक्ति करते है और बाकी उच्च न्ययालय के न्यायाधीशों की  नियुक्ति सम्बन्धी अहिर्तायें अनुच्छेद 217 में दी गई है|
यानी भारत की न्यायपालिका ने न्यायाधीशों की नियुक्तियों में किसी भी प्रकार के राजनैतिक व् विशेष दखल को अवैध माना है और इसकी संतुति की है की कोलेजियम में राजनैतिक दखल भारत की न्याय प्रक्रिया पर भी असर डाल सकता है यानि कोलेजियम व्यवस्था के तहत की गई नियुक्तियां निष्पक्षता को साफ़ तौर पर दर्शाती है यही नहीं भारतीय न्यायपालिका ने प्रथम न्यायाधीश मामले(1982),द्वितीय न्यायाधीश मामले(1993) और तृतीय न्यायाधीश मामले(1998) में न्यायधीशों की नियुक्ति में राजनैतिक दखल को पूर्णता नाकारा है और न्यायपालिका की स्वंत्रता को न्यायधीशो की नियुक्तियों में भी कायम रखा है|
हमारे देश में न्यायपालिका में भारी न्यायधीशों की कमी है जिसके चलते न्याय में काफी समय लग जाता है नया विवाद न्यायधीशों की नियुक्ति से जुड़ा हुआ है जिस प्रकार नियुक्तियों में देरी हो रही वह काफी चिंताजनक है जिसकी वजह न्यायपालिका और केंद्र सरकार में नया तकरार है स्तिथि यहाँ तक पहुँच गई है की कभी भारत के मुख्य न्यायधीश की आँखे छलक जाती हो तो कभी न्यायपालिका,सरकार को कड़ी फटकार लागाते हुए कहती की ऐसे तो सरकार न्यायपालिका पर ताले लगा दे और हम न्याय देना बंद कर दें, स्तिथि को देखतें है की – 31 न्यायधीशो वाले उच्चतम न्यायालय में 6 न्यायाधीशो की कमी है,1056 न्यायाधीशों वाले 24 उच्च न्यायालयों में 465 न्यायाधीशो की कमी है और 20495 न्यायाधीशों वाले तमाम निचली अदालतों में लगभग 5074 न्यायाधीशों की कमी है जिसके चलते लगभग 2.18 करोड़ केस पेंडिंग है जिसमे 22 लाख केस ऐसे है जिसमे 10 वर्ष से सुनवाई ही नहीं हो सकी, लगभग 1 केस की सुनवाई के लिए न्यायलय के पास औसतन 3 मिनट है, ऐसे में कोलेजियम न्यायाधीशों की नियुक्तियां जल्द करना चाहता है लेकिन नियुक्तियों में विवाद नरेन्द्र मोदी सरकार के आने के बाद शुरू हुआ|
केंद्र में भाजपा की पूर्ण बहुमत में सरकार बनते ही,भाजपा ने फैसला किया की वह संसद में विपक्ष को नहीं रखेगी क्यूंकि विपक्ष के पास विपक्षी बने रहने के लिए जरूरी सीटों से भी काफी कम 44 सीटें ही थी जिसको चलते मौजदा विपक्ष ने उच्चतम न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया और न्यायालय ने सरकार को कड़ी फटकार लगते हुए विपक्ष को साथ रखने के लिए कहा जिससे लोकतान्त्रिक और सामाजिक न्याय पर कोई असर न पड़े और भेद और मतभेद बना रहा|
सरकार ने 2014 में  संसद की पहली कार्यवाही में ही 99वां सविधान संसोधन करके न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को यानि कोलेजियम व्यवस्था को चुनौती दी, और यह तर्क दिया की न्यायाधीशो की नियुक्ति में पारदर्शिता अनिवार्य है तथा कोलेजियम की जगह राष्ट्रिय न्यायधीश नियुक्ति आयोग(National Judicial Appointment commision,NJAC) का गठन कर दिया जिसमे न्यायाधीशो की नियुक्ति सम्बन्धी प्रावधान है की NJAC में मुख्य न्यायाधीश व् 2 वरिष्ठतम उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश व् भारत सरकार के कानून मन्त्री व् 2 विख्यात लोग (यह दो विख्यात लोग एक कमिटी द्वारा नियुक्त किये जायेंगे जिसमे मुख्य न्यायाधीश + प्रधानमंत्री + लोकसभा में विपक्ष का नेता होगा और यह 2 लोग तीन-तीन वर्षो के लिए नियुक्त होगें और इन्हें पुनार्युक्त नहीं किया जा सकता) होंगे| यानि इस आयोग में राजनैतिक हस्तक्षेप साफ़-साफ़ दिख रहा है| इसमें यदि मुख्य न्यायाधीश और उच्चतम न्यायलय के दो वरिष्ठ न्यायाधीश चाहें तो किसी के नियुक्ति पर वीटो कर सकते है और वह नाम दोबारा नियुक्ति के लिए नहीं आयेगा और यदि कानून मन्त्री या दो विख्यात लोग में से कोई भी किसी नाम से असहमत है तो भी नियुक्ति रुक जाएगी और ये किसी नाम की सिफारिश भी कर सकते है| इस संसोधन को संसद के दोनों सदनों में पूर्ण बहुमत से पास किया गया व् इसे अमली जमा राष्ट्रपति ने दिसम्बर 31,2014 को मुहर लगा कर दे दिया तथा यह अप्रैल 2015 में लागू हुआ|
सवाल यह खड़ा होता है की सरकार का काम न्यायाधीशो की नियुक्ति में हस्तक्षेप  करना नहीं है बल्कि कोलेजियम द्वारा भेजे गए नामो को सेलेक्ट करना है, क्या देश की राजनीती यह चाहती है की न्याय प्रक्रिया में राजनैतिक दखल हो जिससे न्यायालय सरकार की नीतियों और मनमानी पर सवाल न खड़े कर सके यदि सवाल खड़े करेगी तो न्याय्धीशों की नियुक्ति नहीं होगी? , क्या सरकार ऐसे न्यायाधीशो की नियुक्ति के पक्ष में है जिन न्यायधीशों की विचारधारा सरकार की विचार धारा से मेल खाती हो और उस व्यग्तिगत विचारधारा का प्रभाव न्याय पर भी पड़ सके? , न्यायपालिका में राजनैतिक हस्तक्षेप से क्या न्याय प्रक्रिया पर सवाल नहीं होगा? यह एक ऐसी राजनीती है जिसमे नुक्सान सिर्फ और सिर्फ जनता का होना,अभिव्यक्ति की आज़ादी का होना और भरोसेमंद न्याय का होना है और इससे साफ़ पता चलता है की सरकार देश को यहाँ तक की न्यायपालिका को रिमोट कण्ट्रोल से चलाना चाहती है जिसमे ऐसे लोगो को पबंध किया जा सके जो सरकार के खिलाफ बोलता हो या नीतियों और सोच और सरकार के सामाजिक न्याय पर सवाल खड़ा करता हो,वह विश्वविध्यालय हो या मीडिया और या न्यायपालिका, यह बिलकुल अलोकतांत्रिक और अमानवीय और तानाशाही सोच है जिसको भारत देश ने हर बार नाकारा है|
NJAC के लागू होते ही न्यायपालिका ने इसे सिरे से ख़ारिज कर दिया और यह तर्क दिया की न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सम्बन्ध, न्यायधीशों की नियुक्तियों से भी है और कोलेजियम में संसोधन की कोई गुंजाईश नहीं है लेकिन सरकार का रुख अभी भी न्यायपालिका की स्वत्र्ता को छिनने वाला है NJAC के ख़ारिज होते ही सरकार ने नया पैतरा मेमोरेंडम ऑफ़ प्रोसीजर (MOP) खोजा है जिसमे प्रावधान है की यदि कोलेजियम किसी नाम को ख़ारिज करता है तो उसे उसका कारण लिखित में सरकार के पास जमा करना होगा|
न्यायपालिका और सरकार में तकरार कब तब चलेगा यह तो पता नहीं पर तकरार के चलते नुक्सान सरकार का ही होना है और नुक्सान उन करोड़ो लोगो का जो निष्पक्ष न्याय के लिए अदालतों के सालों-साल चक्कर लगा रहे है लेकिन अदालत के पास समय और न्याय देने वाले न्यायाधीशों दोनों की कमी है, अब सरकार को अड़ियल रुख छोड़कर अदालतों के चक्कर काटने वाले व्यक्तियों पर भी नजर डालना होगा जो गरीबी-लाचारी से जूझते हुए भी न्याय की आस लगाये बैठे है|
-    शुभम कमल
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