एक दलित का दर्द

                                                                                              एक दलित का दर्द
(नोट- एक दलित व्यक्ति से बात करने के बाद  उसके व्यगातिगत पक्षों को उस व्यक्ति के माध्यम से बातचीत का छोटा सा अंश)
राम-राम साहेब! मैं दलित हूँ पर मैं किस लिए दलित हूँ मुझे नहीं पता! , मुझे भगवान् ने तो दलित बनाया नहीं होगा तो फिर इंसान ने मुझे दलित क्यों बनाया?,मैं नहीं जानता,मैं हिन्दू हूँ और हिन्दू धर्म के मुताबिक मुझे सबसे निचला दर्जा प्राप्त है और भारत के सविंधान ने मेरी व्याख्या दलित के रूप में की है पर क्यूँ मैं नहीं जानता!,मुझे दलित होने पर इतना शर्मसार क्यूँ होना पड़ता है या मुझे छुआ-छूत का सामना क्यों करना पड़ता है?
क्या मैं एक आम इंसान नहीं हूँ? आखिर मैं हजारो वर्षो से शोषित जीवन जीने को क्यूँ मजबूर हूँ? मेरी गलती क्या?
दुनिया में जन्म लेना या हिन्दू धर्म में जन्म लेना मुझे यह भी नहीं पता|
मेरी समाज में जिस बराबरी को लेकर राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी से लेकर सविंधान निर्माता भीमराव आंबेडकर ने जीवन पर्यंत लड़ाई लड़ी वो बराबरी मुझे आजतक मिली क्यूँ नहीं,जिस सविंधान ने हमारे संमाज को बराबरी का एहसास करने के लिए सीमित आरक्षण की व्यवस्था की वह आज देश की प्रगति के लिए खतरा कैसा बन गया,हजारो वर्षो से बिना आरक्षण के उच्च पदों पर राज करने वाले व्यक्ति आज राष्ट्रहित में आरक्षण को खतरा क्यूँ मान रहे है जबकि आरक्षण को लागू हुए को कुछ ही दशक हुए है?
जिस आरक्षण की व्यवस्था हमें हासिये से उठाकर सामान्य इंसानों और भेदभाव रहित समाज में जीने के लिए की गई है वो व्यवस्था इतनी नासूर कैसे बन गई?
क्या विकास केवल उच्च वर्ग का हो जिसके पास पहले से अच्छी शिक्षा और पर्याप्त संसाधन है और क्या अशिक्षित दलितों का विकास,देश के विकास में घातक है?
हम दलितों की आय अन्य जाति के लोगों से काफी कम है इसीलिए शिक्षा में कम फीस का प्रावधान है,आज भी हमारे बच्चे सरकारी विद्ध्यलों और मिद्देमील का चक्कर काटने को मजबूर है यदि उच्च वर्ग के भी बच्चे गरीब है तो वो भी हमारी तरह,हमारे साथ क्यूँ नहीं पढते/उनकी संख्या सरकारी स्कूलों में  हमारी संखया से इतनी कम क्यूँ है? यह गरीब-गरीब में ऐसा फर्क कहीं भेदभाव या छुआ-छूत की तरफ तो इशारा नहीं करता!
हम बाबा साहेब को अपना भगवान् मानते है क्यूंकि उन्होंने केवल दलितों के लिए बल्कि प्रत्येक वंचित/शोषित/पीड़ित/पिछड़े वर्ग के लिए सच-मुच बहुत कुछ किया है,दशको बीत गएँ बाबा साहेब के जन्मदिवस या म्रत्दिवास पर सारी राजनैतिक पार्टियाँ में बाबा साहेब की प्रतिमा के साथ फोटो खिचवाने की होड़ मच जाती है पर दशको बाद भी न हमारी तस्वीर बदली न तकदीर कुछ बदला है तो वो है सरकारे.
हमारी याद किसी पार्टी को तब क्यूँ नहीं आती जब हमपर आत्याचार होता है और तब क्यूँ आती है जब चुनाव आते है?
देश की 16.6% आबादी दलित है,हमारी आय बहुत कम है,हम ज़्यादातर मजदूरी,कृषि,छोटे व्यापर पर निर्भर है यहाँ तक की केवल 4% दलित आबादी सरकारी नौकरियों में है,क्या राजनैतिक दल इसको समस्या के रूप में नहीं देखते और वे दलितों में गरीबी को मुद्दा की तरह जिंदा रखना चाहते है ताकि चुनाव के वक्त उनका दोहन कर सके?
हम दलितों पर 2014 की एन०सी०आर०बी रिपोर्ट के मुताबिक 47,064 अपराध हुए जो 2013 में 39,408 थे,हमारी महिलाओं से 2014 में 2,223 बलात्कार हुए,744 हत्या हुई,यह सब क्यूँ हुआ? क्या हम जीने का हक नहीं है और यदि है तो क्या एक सामान्य व्यक्ति की तरह नहीं!
हमारे एक बच्चे(रोहित वेमुला) को आत्महत्या केवल इसलिए करनी पड़ती है की वह दलित है,हमारी एक बेटी(जीसा,केरल से) के साथ इसीलिए बलात्कार होता है की वह भेदभाव से लड़ना चाहती थी,गुजरात में 7 दलितों को नग्नावस्था में इसीलिए पीटा जाता है की वह पेट-पालने के लिए मरी हुए गाय की खाल उतारने का काम करते है ऐसी कई केस है पर क्यूँ?
हमे अनेक राज्यों में प्रवेश वर्जित क्यूँ है,क्या मंदिर किसी की निजी सम्पति हो सकती है?,हमारी साक्षरता दर 2001 में 34.76% थी जो 2011 में बढकर 66.10% हो गई,क्या हमारी 10 वर्षो में बड़ी 90% साक्षरता दर के कारण उच्च वर्गों का आक्रोश हमपर ज्यादा है?क्या हमने किसी के अधिकारों का हनन किया?
आखिर ऐसा क्यूँ है की किसी का दलित होना साजिश का वयास बनता है और फिर दूसरों में आक्रोश पैदा करता है?
पिछले कुछ दशको को देखें तो दलितों के खिलाफ हिंसा की तक़रीबन घटनाएँ बताती है की यह तब घटी जब दलितों ने किसी गैर-दलितों के साथ किसी प्रकार की बराबरी को दर्शाया है पर क्यूँ?
यहाँ तक की हमारे बच्चे गैर-दलितों के बच्चों के साथ प्रेम करने का सपना तक नहीं देख सकते,गैर-दलित प्रतिष्ठा को हलकी सी भी चोट महसूस होने पर बदला लेने का सबसे आसान औजार दलित महिला की इज्ज़त ही क्यूँ बन जाती है?
क्या गैर-दलितों में दलितों के प्रति एक व्यवस्थापक नफरत भरी रहती है और मौका पाते ही फटकर बहार आ जाती है?
हजारो वर्षो से सबसे ऊँची जाति का पूजा-स्थलों की पुरोहितों पर कब्ज़ा रहा है और लिखने-पड़ने व् जमीन-जायदाद के तमाम अधिकार  उसे हासिल रहे है,निचली जातियां बिना किसी अधिकार के सिर्फ निचले दर्जे के काम करती रहीं है और जब कोई इस सवाल को उठाता है तो उसे भारी प्रताड़ना झेलनी पड़ती है ऐसा क्यूँ?
दलित उत्पीडन रोकने हेतु इस देश में कड़े कानूनों का प्रावधान है पर कानून का पालन कराना राज्य और प्रशासन की ज़िम्मेदारी है,कड़े कानूनों को संमाज में न लागु करना कहीं प्रशासन में मौजूद व्यक्तियों में भेदभाव की प्रवत्ति को तो नहीं दर्शाता?

“दलितों को अपनी अत्कारिकता से बाज आना ही होगा और कर्म की उस अवधारणा पर सवाल खड़ा करना होगा जो उन्हें हमेशा गुलाम बनाये रखती है और यह मानने को बाध्य करती है की यही सत्य है”....
                                        -  Shubham Kamal 
                                                                                                         

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