महिलाओं को मानसिक आजादी कब?

अक्सर हम भारतीय कुछ लोंग जब कभी एक ऐसी खबर पढते है/सुनते है/देखते है की आज एक प्रेमी जोड़े ने आत्महत्या कर ली या प्रेमी युगल की हत्या कर दी गई या प्रेमी ने प्रेमिका से दूर रहने के कारण आत्महत्या कर ली तो हम इन खबरों से अपना ध्यान हटा लेते है और इन खबरों को नजरंदाज कर देते है पर यदि हम एक ऐसी खबर सुनते है की प्रेमिका को लेकर प्रेमी हुआ फरार या प्रेमी-प्रेमिका ने घर से भाग कर रचाई शादी तो क्रोध आता है,कई व्यक्ति तो ऐसा महसूस करते है यदि वह उनकी बेटी/बेटा होती तो वो उनको जान से मार देते.

ऐसी रूडिवादी सोच हमारे संमाज में आज भी जीवित है,कुछ अभिभावक अपने पुत्र या पुत्री को अपने कुल या जाति के ही वर/बधू से शादी करने की सलाह देते है तो कुछ लोंग कभी-कभी उनको ऐसा करने के लिए मजबूरन बाध्य करते है जो की अंततः एक जटिल समस्या बन जाति है और यह जटिल समस्या कभी-कभी प्रेमी युगलों की जान तक ले लेती है,और समाज को शर्मशार कर देती है और कुछ युवक ऐसा मानते है की उनको उनके कुल/जाति के ही अनुसार शादी करनी चाहिए जिससे देश में हिंसा न हो और यह हमारा दुर्भाग्य है की ऐसी सोच रखने वाले व्यक्ति हमारे समाज में मौजूद है और जाति नामक जहर समाज में घोलकर हमारी महिलाओं की इच्छा शक्ति का गला घोंट रहे है|
इसका सबसे बड़ा कारण इस देश में व्याप्त जाति व्यवस्था है,हमारे धर्मो/ग्रंथों/पवित्र किताबों में यह व्यवस्था व्याप्त है जो पहले तो हमारे जन्म लेती ही हमारी जाति और औकात से अवगत करा देती है,जन्म लेती ही हम उंच या नींच में विभाजित हो जाते है,जब तक हम धीरे-धीरे बड़े होते और इस सामाजिक व्यवस्था को समझते है हम जाति नामक बिना टूटने वाली जंजीर से पूर्णता जकड चुके होते है,जब हम विद्यालय/कॉलेज/यूनिवर्सिटी में पड़ने जाते है तो एक उम्र तब आती है जब हम किसी लड़के/लड़की को अपना दिल दे बैठते है और बात बड़ते-बड़ते एक दिन शादी तक पहुँच जाति है,जब एक लड़का किसी लड़की से कहता है की मुझे तुमसे शादी करनी है/तुम्हे अपना हमसफ़र चुनना है तो लड़की का जवाब कुछ इस तरह आता है,
“मेरे पिता जी मेरी शादी किसी मेरी ही जाति के लड़के से कराना चाहते है या किसी अच्छे व्यापारी से कराना चाहते है या किसी डाक्टर/इन्जीनेअर/अधिकारी से कराना चाहते है मैं आपसे शादी नहीं कर सकती;सॉरी ....!”
उस दिन इस जाति नामक कीड़े का एहसास होता है जो कीड़ा इस अवस्था में इतनी जोर से कट्ता है की प्रेम करने वाले प्रेमियों की जान भी ले लेता है.
कहते है प्यार तो दो व्यक्तियों के दिल जुड़ने से होता है यह जाति/पात/उंच/नींच/धर्म/समुदाय/कुल/सुन्दरता/आर्थिक स्तिथि/समाजिक स्तिथि नही देखता,जिस अवस्था में व्यक्ति प्यार कर बैठता है तो अब उसे टकराना होता है हजारो वर्ष पुरानी जाति व्यवस्था से,जो व्यक्ति इस व्यवस्था से टकराकर जीत जाता है उसे उसकी मोहब्बत मिल जाती है और जो नहीं टकरा पाते उनको या तो संमाज के सामने शर्मिंदा किया जाता है या वे आत्महत्या का विकल्प चुन लेते है.
और जो व्यक्ति हमारे समाज में अंतर जातीय विवाह करते भी है तो उनको समाज में हीन भावना से देखा जाता है|
पहले हमारे संमाज में सती प्रथा व् विधवा पुनःविवाह न होना जैसी कुप्रथा थी जिसे सैकड़ो वर्ष बाद सामाजिक हित में नष्ट कर दिया गया है पर जातिवादी व्यवस्था को पूर्णता नष्ट किया गया एह व्यवस्था आज भी कई लोगो को ग्रसित किये हुए है| इसके लिए कुछ कठोर कानून भी बनाये गए पर उन कानूनों का पालन जमीनी स्तर पर ख़ासा दीखता नहीं|
कुछ लोंग कहतें ही की प्यार करना/अपनी मर्जी से शादी करना/महिलाओं को हाँ व् न कहने का अधिकार होना,हमारी संस्कृति के खिलाफ है,भारतीय संस्कृति धर्मो की विरासत है और हमें इसे आगे ले जाना चाहिए,जो महिलाएं अपने आप को आज़ाद मानती है वो पश्चिमी सभ्यता से ग्रसित है|
मैं कहता हूँ की यदि भारतीय संस्कृति महिलाओं के उनके बुनियादी अधिकार नहीं दे सकती/उन्हें घुमने-फिरने की आजादी नहीं दे सकती/हाँ य न कहने का अधिकार नहीं दे सकती/अपने मन-मुताबिक चिंजो का चुनाव का अधिकार नहीं दे सकती,तो यह संस्क्रती नहीं बल्कि शोषण है,यह शोषण नाम की संस्कृति हम पर जन्म लेती ही थोप दी जाती है,यदि पश्चिमी सभ्यता हमें कुछ नया व् सामाजिक हित के लिए आवश्यक चीज़ दे सकती है तो हमें हमें उसे स्वीकार कर लेना चाहिए,पश्चिमी सभ्यता का यह मतलब नहीं की उसको मानने वाला व्यक्ति खुले वस्त्र पहनकर घुमने लगे|
स्वंत्रता के 70 वर्ष बीत गए,सविंधान के लागु हुए 66 वर्ष बीत गए पर अब भी महिलाओं को उनके अधिकार प्राप्त नहीं है,महिलाएं अब भी ग्रामीण क्षेत्रों में घर में ही रहने की भावना से ग्रसित है,वो अपनी मर्जी से अपना हमसफ़र नहीं चुन सकती/हाँ या ना नहीं कर सकती तो यह आजादी हमारे किस काम की|
दर्हसल जब कोई बेटी अपने अभिभावक से कहती है(सहमे लब्जो में) की उसे अपने मन-मुताबिक तरीके से करनी है/उस व्यक्ति से करनी है जिसे वो प्यार करती है,तो अभिभावक उसकी इस सोच को सीधे पश्चिमी संस्कृति से जोड़कर देखने लग जाते है पर यह एक दम गलत तर्क है महिलाओं की यह सोच तो अच्छी शिक्षा/देशव्यापी शिक्षा/देश व् समाज का उद्धार योग्य शिक्षा,के ढाँचे में ढली सोच है जो इस देश व् संमाज का उद्धार करने वाली एक मात्र शर्त है|

आज की 21 वीं शताब्दी में हम महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित नहीं कर सकते,हम कुछ दिन ही उनपर अपनी इस शोषण वाली संस्कृति को थोप सकते है पर जब वे किसी कॉलेज/यूनिवर्सिटी में अच्छी शिक्षा पाएंगे तो वह भी एक न एक दिन इस रूडिवादी व्यवस्था का विरोध करेंगे.
भारत में महिलाओं को मानसिक आजादी न होना एक जटिल समस्या है,और यह समस्या दिन व् दिन हिंसा का रूप लेती चली आ रही है,इस समस्या के समाप्त न होने का एक यह भी कारण है की हम ऐसी खबरों(प्रेमी-युगल की हत्या,आत्महत्या,इत्यादि) को नजर अंदाज कर देंते है,इस पर विचार-विमर्श की आवयश्कता है,महिलाओं को जन्म लेती ही धार्मिक किताबें नहीं बल्कि सविंधान की किताब को थामना चाहिए जो समता,समानता,बधुत्व,स्वंत्रता का प्रतीक है और विवाह को अंतर जातीय तक ही सीमित न रखकर,अंतर-सामुदायी और अंतर-धर्मीय भी करना चाहिए,एक बात बिलकुल सत्य है की यदि हमने महिलाओं को मानसिक आजादी दे दी तो वह दिन दूर नहीं जब भारत बाकी सामाजिक विकशित देशों के साथ कदम से कदम मिलाकर खड़ा होगा अब हमें महिलाओं को उनके बहुमूल्य/जन्मसिद्ध/बुनियादी(अपनी पसंद का चुनाव) अधिकार उन्हें प्रदान करने होगें और वह समय अभी है....

                                                                                                         -                                         शुभम कमल  




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