बेटियों की प्रसंशा झूठी है?

ओलेम्पिक शुरू हुए लगभग 10 दिन हो चुके थे,अमेरिका सबसे ज्यादा मैडल ले जा चूका था ,हम भारतीय एक पदक की आस में रात भर टेलीविजन के सामनें बैठे रहते पदक नही आता,कभी लगा की आज भारतीय तीरंदाजी टीम भारत को एक पदक दिला देगी पर आखिरी वक्त में हार गई,गतवर्ष के स्वर्ण पदक विजेता अभिनव बिंद्रा से भी उम्मीदें ख़त्म हो गई थी,ऐसे में भारत के छोटे से राज्य त्रिपुरा से आई भारत की 22 वर्ष की बेटी दीपा करमाकर ने एक एतिहासिक ख्याति दर्ज की वो अब 52 साल बाद पहली भारतीय महिला बनी थी जिन्होंने जिमनास्टिक के वाल्ट फाइनल में जगह बनायीं थी,मनो सारी उम्मीदें,आशायें फिर से जाग्रत हो गई,पुरे देश ने उन्हें सराखों पर बिठाया और एक पदक की उम्मीद लेकर बैठ गए लेकिन दीपा भी फाइनल में अच्छे प्रदर्शन करते हुए 4th स्थान रहीं,मैडल से एक कदम दूर,थोड़ी निराशा हुई पर इस नन्ही से बेटी ने करोणों भारतियों का दिल जीत लिया.
एक मौका और निकल चूका था अब मुकाबला होना था 58 kg महिला कुश्ती का जिसमे भारत की तरफ से अगुवाई कर रहीं थी हरियाणा-रोहतक की साक्षी मालिक,देर रात टीवी देखने के बाद उदासी का मंज़र आ गया और टीवी बंद करदी,पर यह रात वह रात थी जब भारत की झोली में मैडल आने वाले था खैर जब सुबह हुई तो न्यूज़ चैनल लगाया तो देखा  एक मोती-मोती हैडलाइन सामने प्रद्रशित हो रही थी,लिखा था "साक्षी मालिक ने भारत को पहला कास्यं पदक दिलाया" मुझे अपनी धुंधली आखों पर विश्वास न हुआ और तुरंत ट्विटर लाग इन किया और ट्रेंड्स बटन को प्रेस किया,पहले ही नंबर पर #साक्षी मालिक ट्रेंड कर रहा था,ट्रेंड को ओपन किया तो देश के तमाम बड़े से लेकर छोटे और छोटे से लेकर सामान्य आदमी साक्षी मालिक को बधाई दे रहे थे अब विश्वास हो चला था की हाँ मैडल तो आ गया है मैंने भी एक ट्वीट में उनको बधाई दी और उनकी जीत पर खुसी जताई.
ट्विटर पर कोई कह रहा था भारत का गर्व बेटी,बेटी-बचाओ,बेटी-पड़ाव,नारी शक्ति जिन्दाबाद   इत्यादि!
अभी तो खुशी का सिलसिला जारी था की हैदराबाद की एक बेटी(पी वी सिन्धु) ने ओल्याम्पिक बैडमिंटन के फिनाले में जगह बना ली,इस जीत ने खुशी को दुगना,चौगाना कर दिया,अब इस बात का एहसास हो चला था की अबकी बार हिंदुस्तान की बेटियों का दम है ओलिंपिक में, अब देश के प्रधानमंत्री,राष्ट्रपति,फ़िल्मकार,साहित्यकार,खिलाडी,सामान्य जन सब अपनी खुशी और बधाई दे रहे थे यह बधाई का दोज और बड जाता यदि सिन्धु गोल्ड पदक जीत जाती लेकिन उनके अथक प्रयासों के बाबजूद उन्हें फाइनल में हार का सामना करना पड़ा और सिल्वर पदक से संतोष करना पड़ा,इस दौरान मैच के अंत तक पुरे देश में पार्थना,पूजापाठ व् सिन्धु के लिए दुआएं होती रही,सोशल मिडिया पुरे दिन सिन्धु को ही ट्रेंड करता रहा|
आज तक जिस खेल की हमें ज्यादा जानकारी भी नही थी उस खेल को लेकर हम इतने दीवाने हो गए,जिस देश में क्रिकेट को धर्म माना जाता हो उस देश में बैडमिंटन और कुश्ती का खुमार अद्भुत था,क्या हमारी राष्ट्रवाद की भावना आगे थी या बेटी को आगे बाड़ाने की भावना!
एक पल के लिए ऐसा लगा की समाज और देश कितना बदल चूका है लेकिन कुछ समय बाद याद आया की देश के बेटियां पहले भी पदक जीत चुकी है,पहले भी देश को गौरान्वित कर चुकी तब तो समाज नही बदला बल्कि देश क बेटियों की स्तिथि बद से बत्तर होती चली गई,पर पहली बार देश के लोगों का देश की महिलाओं के प्रति सम्मान देखकर कुछ सवाल जहन में उठ रहे है-
क्या अब भ्रूण हत्या पूर्णता रुक जाएगी?
क्या अब महिलाओं पर अत्याचार थम जायेगा?
क्या अब असामनता ख़त्म हो जाएगी?
क्या अब महिलाओं को उनके सारे अधिकार प्राप्त हो जायेंगे?
क्या अब महिलाएं अब मन-मुताबिक शादी करने में सक्षम होगी?
क्या अब वह सरंक्षक जो इन बेटियों के सम्मान में कशीदे गड रहे है वो जब अपने बच्चे के लिए बहु देखने जायेंगे तो दहेज़ की मांग को नही रखेगे?
क्या जो युवा इन बेटियों को बधाइयाँ दे रहे है वो युवा अब किसी महिला को हीन भावना से नही देखेंगे?
क्या अब महिलओं को उनकी उन्नति में सामाजिक बाधाओं का सामना नही करना पड़ेगा?

ध्यान दे तो कुश्ती में कांस्य पदक दिलाने वाली साक्षी मालिक उसी राज्य हरियाणा से आती है जहाँ बेटी,बचाओ-बेटी,पडाव अभियान की सुरुआत हुई, तो समाज बदला कितना|
फिर ध्यान आया की देश की बेटियां पहले भी पदक जीत चुकी है,जिसमे नेहवाल,मलेस्स्वरी,मैरी कोम शामिल है पर देश नही बदला उस समय भी ऐसा ही बेटियों का सम्मान हुआ था और बाद में हम उनको भूल गए,क्या जब कोई बेटी पदक जीते तब ही उसका सम्मान होगा या हम केवल इन बेटियों(नेहवाल,सिन्धु,साक्षी,कोम,सानिया,दीपा ….) को भारत की बेटियां पूर्णता मान रहे है? या हम इनको भी भुला देंगे|
भारतीयों की बेटी के सम्मान वाली भावना तक क्यों नही नज़र आती जब किसी बेटी के साथ बलात्कार होता है,तक क्यूँ नही नज़र आती जब दहेज़ की मांग करते है,तब क्यूँ नही नज़र आती जब महिलाओं को असमानता का सामना करना पड़ता है|
भारत की हर बेटी दीपा करमरकर है,सिन्धु है,साक्षी है,नेहवाल है,कोम है फिर हमारा सम्मान इन बेटियों तक ही क्यूँ सीमित है भारत की अन्य सामान्य बेटियों को क्यूँ नही?
यदि भारत की बेटियों पर गर्व करना है तो भारत की प्रतेक बेटी पर गर्व होना चाहिए,चाहें वो जो भी हो न की इन बेटियों पर गर्व के दिखावे की..........!
ओल्याम्पिक में जीत का सिलसिला जारी है …........................
                                                                              
                                                                                     -शुभम कमल

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