सियाचिन:लड़ाई कुदरत से

सियाचिन एक ऐसी जगह जहाँ जंग होती है कुदरत और फौलादी इरादों के बीच , लेकिन इस जंग में बाजी दोनों तरफ से जबरजस्त लगती कभी कुदरत अपना कहर बरपता है तो कभी इंसान कुदरत को मात देकर भारत माता का सर गर्व से ऊँचा करते है वैसे ऐसा मन जाता है कुदरत के कहर के आंगे किसी कि नहीं चलती पर जो कुदरत से लड़ने को तैयार रहतें है ऐसी फौलादी इरादे केवल भारत माता के वीर सपूत होते है|

दर्हसल मसला कुछ यूँ है -
सियाचीन ,जम्मू -कश्मीर में लद्धाख इलाके में बसा एक कुदरत का करिश्मा ठंडा ग्लेसिअल है जिसके सटे भारत,चीन और पाकिस्तान के बॉर्डर लगते है तापमान इतना है की सुनकर रूह काँप जाएँ |

-५० डिग्री से कम तापमान में फौलादी इरादे के साथ दुश्मन को उसी इलाके में ढेर करने की छमता के साथ भारत के जवान दते रहतें है ,करीब १ साल में ३६ फिट बर्फवारी से जीवन अस्त व्यस्त हो जाये पर उनको कोई फर्क नही पड़ता भारत के बॉर्डर के सुरकचा के लिए वे किसी भी हद तक जाने के लिए हमेसा तैयार है ....

भले ही वंहा करीब १० साल से गोलाबारी नही हुई हो पर घुसपैठ का खतरा हमेसा बना रहता है कहना असान है की लेकिन करना नामुम्लिन पर इस नममुम्किन को मुम्किम कर दिखाते है भारत माता के लाल

भारत सर्कार इनके लिए सबसे ज्यादा रूपए खर्च करता है करीब ५ करोड़ रुपये रोजाना ...
साल में लगभग १५०० करोड़ रूपए जरा सी चूक कितनी भरी पद सकती है इसलिए सरकार इतना पैसा खर्च करती है ..

हम इस योगदान को किसी भी सब्दो में एक्सप्लेन नहीं कर सकते ..
इसके लिए सिलेक्शन कुछ इस प्रकार होता है-

  • सियाचिन में जानने वाले जवानों को बहुत ही तफ सिलेक्शन से गुजरना पड़ता है |
  • सबसे पहले उन जवानों को फिजिकल टेस्ट के लिए सेलेक्ट किया जाता है जो नामी जवान है वैसी हर जवान भारत माता के लिए मरने को तैयार है पर सियाचिन जैसी जगह पर मरने का सौभग्य कुछ सैनिक को नसीब है |
  • अब सिलेक्टेड जवानों को बहुत की कड़ा फिजिकल टेस्ट होता है जिसमे कुछ ऐसी चीज पर्खिं जतिन है जो किसी भी मौसम में अपने आप को एक्टिव में सहायक है |
  • एक बार में ३०० जवानों को विभिन्न जगह से फिजिकल taste पास करते है जिसमें से करीब १००० जवानों का टेस्ट लिया जाता है |
  • इन ३०० जवानों को अब एक महीने की स्पेशल ट्रेंनिंग से गुजरना होता है जिसमे -५० डिग्री से भी कम तापमान में अपने आप को किस तरह एक्टिव रहना है यह सिखाया जाता है 
अब २०-२० जवानों को एक रस्सी के जरह २१००० फिट ऊपर भेजा जाता है ३०० जवानों को इसी तरह भेजा जाता है


  • ओक्सीगेनकी कम मात्र के कारन वहन सांस लेना बहुत मुस्किल है वहां केवल २-१०% ही ओक्सीगेन है 
  • ३०० जवानों की पोस्टिंग एक बार में ३ महीने के लिए होती है|
  • तापमान इतना काम है की अगर सरीर का अंग १ sec के लिए खुल जाये तो वह अग सिकुड़ कर ख़राब हो जाता है और बाद में उसे काटना ही आखिरी रास्ता है 
  • ऑंखें खोल दें तो आंखे पत्थर बन जाएँ 
  • पसीना भी बर्फ बन जाता है |
  • जवान ३ महीने में न तो नाहा सकते है और न तो सेव करसकते है 
  • एक जवान के पीठ पर २० किलो का थैला होता है जिसे लड़कर वो लगभग २१००० फिट ऊपर जाता है 
  • परिवार के लोगों से कोई संपर्क करने का साधन है |
  • जवान खुद नही जानते की कब कुदरत का कहर टूट पड़े और कब उनकी पोस्ट बर्फ में दब कर कब्र बन जाएँ एक बार इंसान दुश्मन की गोली से बच सकता है लेकिन कुदरत कुदरत के कहर से नही 
  • जवान जातें है की सायद ३ महीन बाद वो वहां से लौटेगें या नही 
  • पर अपना धर्म वो कभी नही भूलते |
  • तजा भोजन नही खा सकते 
पर उनके सहस को दुश्मन क्या कुदरत भी नही कमजोर नही सकता ,
दोस्तों एक बार मैं फिर बतांदु की यह जिंदगी सबको नही मिलती और जिनको मिलती है वो भगवान् के भेजे हुई फरिस्ते है उनकी कबिलिअत का किसी को अंदाज़ा नही है |

दोस्तों मैं भी ऐसी ज़िन्दगी जीना चाहता था लेकिन भगवान् ने मुझे ऐसा नही बनाया और में hight केवल १६५cm है


अंत में केवल इतना कहना चौहुंगा की हम ऐसे जवानो का सुक्रिया करने के लिए सब्द नही है पर ऐसो जवानों पर हमें और हर भारत वासी की नाज है -   
                                                                                      शुभम कमल
                                                                                        कन्नौज


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